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क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, जिसपर इतना बवाल मचा रहा है विपक्ष और सोशल मीडिया
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत का ₹92,000 करोड़ का रणनीतिक प्रोजेक्ट है. इसमें पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप और पावर प्लांट बनेंगे. यह हिंद महासागर में भारत की सुरक्षा और व्यापार को मजबूत करेगा, लेकिन पर्यावरण और आदिवासी प्रभाव को लेकर विवाद हो रहा है.
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत सरकार का एक बहुत बड़ा और महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है. यह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार पर बनाया जा रहा है. इस प्रोजेक्ट की कुल लागत लगभग 72,000 से 92,000 करोड़ रुपये है. इसमें बड़ा अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, इंटरनेशनल एयरपोर्ट, टाउनशिप और पावर प्लांट शामिल हैं.
यह प्रोजेक्ट भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में मजबूत बनाने के लिए बनाया गया है. लेकिन इस पर काफी विवाद भी हो रहा है. कुछ लोग इसे पर्यावरण और आदिवासी संस्कृति के लिए खतरा बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी बता रही है.
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प्रोजेक्ट क्या है और इसमें क्या-क्या बनेगा?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को तीन चरणों में पूरा किया जाएगा. पहले चरण में 2025 से 2035 तक काम होगा.इसमें गलाथिया बे में एक बड़ा पोर्ट बनेगा, जिसकी क्षमता शुरू में 4.4 मिलियन TEU और बाद में 16 मिलियन TEU होगी. यह पोर्ट इतना गहरा होगा कि बड़ी-बड़ी जहाजें आसानी से आ-जा सकें.
इसके अलावा एक नया इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनेगा, जो सिविल और डिफेंस दोनों कामों के लिए इस्तेमाल होगा. 450 MVA का गैस और सोलर आधारित पावर प्लांट बनेगा, ताकि बिजली की समस्या न हो. एक नई टाउनशिप भी विकसित की जाएगी, जिसमें घर, दुकानें और अन्य सुविधाएं होंगी.
कुल मिलाकर 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विकास होगा, जो पूरे अंडमान-निकोबार के बहुत छोटे हिस्से के बराबर है. यह प्रोजेक्ट भारत के सागरमाला कार्यक्रम का हिस्सा है. सरकार का कहना है कि यह द्वीप को पर्यटन, व्यापार और सुरक्षा का हब बना देगा.
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क्यों हो रहा है इतना विवाद?
इस प्रोजेक्ट पर सबसे ज्यादा विवाद पर्यावरण को लेकर है. राहुल गांधी समेत कई लोग कह रहे हैं कि इससे 160 वर्ग किलोमीटर जंगल कटेगा, लाखों पेड़ों को नुकसान पहुंचेगा और समुद्री जीव-जंतु प्रभावित होंगे. वे इसे देश की प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ अपराध बता रहे हैं.
कुछ लोग कहते हैं कि इससे शोम्पेन और निकोबरी जनजातियों की संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी. लेकिन सरकार इन आरोपों को खारिज करती है. सरकार के अनुसार कुल जंगल क्षेत्र का सिर्फ 1.82% प्रभावित होगा. 18.65 लाख पेड़ों में से ज्यादा से ज्यादा 7.11 लाख पेड़ काटे जाएंगे और वह भी अलग-अलग फेज में.
बाकी 65.99 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को हरा-भरा रखा जाएगा. पर्यावरण मंजूरी के लिए बहुत सारे अध्ययन किए गए, जिसमें वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जैसे संस्थानों की रिपोर्ट शामिल हैं. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है.
राजीव गांधी सरकार से क्या संबंध?
इस प्रोजेक्ट का सीधा संबंध राजीव गांधी सरकार से नहीं है. यह नरेंद्र मोदी सरकार का प्रोजेक्ट है, जिसकी शुरुआत NITI आयोग ने 2021 में की. लेकिन इतिहास देखें तो 1985 में राजीव गांधी ने अंडमान-निकोबार को सिंगापुर या हांगकांग जैसा ट्रेड हब बनाने का विचार रखा था. कांग्रेस शासन में भी द्वीपों पर विकास की योजनाएं चली थीं. इसलिए विपक्ष पर पलटवार करते हुए सरकार के समर्थक कहते हैं कि पहले कांग्रेस भी विकास चाहती थी, अब विरोध क्यों कर रही है?
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भारत को क्या फायदे होंगे?
यह प्रोजेक्ट भारत के लिए बहुत बड़ा रणनीतिक फायदा देगा. ग्रेट निकोबार मलक्का स्ट्रेट के काफी करीब है, जहां से दुनिया का 30% व्यापार गुजरता है. यहां पोर्ट बनने से भारत को विदेशी पोर्ट्स (जैसे कोलंबो, सिंगापुर) पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी. इससे भारत का पैसा बचेगा और राजस्व बढ़ेगा. अनुमान है कि 2040 तक सालाना 30,000 करोड़ रुपये का फायदा हो सकता है.
रक्षा के लिहाज से यह प्रोजेक्ट भारत को अंडमान सागर में मजबूत बनाएगा. चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति का मुकाबला करने में मदद मिलेगी. भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना की मौजूदगी बढ़ेगी. समुद्री रास्तों की निगरानी आसान होगी. अर्थव्यवस्था को भी बूस्ट मिलेगा - 40 से 50 हजार नौकरियां, पर्यटन बढ़ेगा, शिप रिपेयर और लॉजिस्टिक्स का नया हब बनेगा. द्वीपों पर बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं बेहतर होंगी.
पर्यावरण की सुरक्षा कैसे होगी?
सरकार का दावा है कि पर्यावरण को पूरा ध्यान दिया गया है. EIA (एनवायरनमेंट इंपैक्ट असेसमेंट) और CRZ नियमों के तहत मंजूरी ली गई. कोरल ट्रांसलोकेशन, वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट प्लान और लगातार मॉनिटरिंग की व्यवस्था है. 3 अलग-अलग कमेटियां बनाई गई हैं- प्रदूषण, जैव विविधता और आदिवासियों की देखभाल के लिए.
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काटे गए पेड़ों की भरपाई के लिए हरियाणा और मध्य प्रदेश में हजारों हेक्टेयर पर पेड़ लगाए जाएंगे. द्वीप पर 75% से ज्यादा जंगल पहले से है, इसलिए स्थानीय स्तर पर CA (कॉम्पेंसेटरी अफॉरेस्टेशन) की जरूरत नहीं पड़ी.
आदिवासी समुदायों का क्या होगा?
सरकार स्पष्ट कहती है कि कोई आदिवासी विस्थापन नहीं होगा. शोम्पेन और निकोबरी जनजातियों के हितों की पूरी रक्षा की जाएगी. ट्राइबल रिजर्व क्षेत्र में नेट बढ़ोतरी होगी. पुरानी पॉलिसी (जारावा पॉलिसी 2004 और शोम्पेन पॉलिसी 2015) का पालन किया जाएगा. मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स से NOC लिया गया है.
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है. यह भारत को हिंद महासागर में मजबूत बनाएगा, लेकिन विवाद इसलिए है क्योंकि कोई भी बड़ा प्रोजेक्ट इको-सेंसिटिव जगह पर चुनौतियां लाता है. सरकार कहती है कि सभी मंजूरियां ली गई हैं. न्यायिक जांच हो चुकी है. निगरानी की पूरी व्यवस्था है. यह प्रोजेक्ट सफल हुआ तो भारत की रक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय ताकत बढ़ेगी. लेकिन इसके लिए पारदर्शिता, सख्त निगरानी और जनता की भागीदारी जरूरी है.
Source: AajTak
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