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इंसान लड़ते क्यों हैं

इंसान लड़ते क्यों हैं? गृहयुद्धों का चिम्पैंजियों से कौन सा कनेक्शन जोड़ रहे साइंटिस्ट
युगांडा के नगोगो जंगल में 200 चिम्पैंजियों का विशाल समूह 20 साल तक शांतिपूर्वक रहता था. 2015 में यह दो गुटों में बंट गया. पुराने दोस्त अब दुश्मन बन गए. 2018 से शुरू हुए खूनी गृहयुद्ध में एक गुट ने दूसरे के 7 वयस्क नर और 17 बच्चों को मार डाला. कुल 24 मौतें हुईं. वैज्ञानिक कहते हैं- वे सभी अपनी सफलता के शिकार बने. भोजन की कोई कमी नहीं थी, फिर भी युद्ध छिड़ा. यह इंसानी गृहयुद्धों की जड़ बताता है.
युगांडा के घने जंगलों में एक बार 200 चिम्पैंजियों का विशाल परिवार 20 साल तक साथ रहता था. वे एक-दूसरे के साथ खेलते, साथ शिकार करते, साथ बच्चे पैदा करते और पड़ोसी समूहों पर हमला करके अपना इलाका बढ़ाते थे. सब कुछ शांतिपूर्ण था. लेकिन अचानक तीन साल में ही सब कुछ बदल गया.
पुराने दोस्त अब एक-दूसरे को मारने लगे. नरों को मारा, फिर बच्चों को भी नहीं बख्शा. अब तक 24 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. युद्ध अब भी जारी है. वैज्ञानिकों ने 30 साल की लगातार निगरानी के बाद इसकी पूरी कहानी Science जर्नल में बताई है. यह कहानी सिर्फ जंगली जानवरों की नहीं, बल्कि इंसानी गृहयुद्धों की जड़ों को भी समझाती है.
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नगोगो इलाके के ये चिम्पैंजी इतने सफल थे कि उनका समूह लगातार बढ़ता गया. भोजन की कोई कमी नहीं थी. जंगल में फल-फूल भरपूर थे. फिर भी 2015 में अचानक दो बड़े गुट बन गए – सेंट्रल और वेस्टर्न. पहले दोनों गुट एक-दूसरे से मिलते-जुलते थे, बच्चे पैदा करते थे. लेकिन जून 2015 को एक दिन सेंट्रल वाले चिम्पैंजी वेस्टर्न वालों को भगा दिए. उसके बाद दोनों गुट अलग-अलग रहने लगे.
वैज्ञानिक कहते हैं - वे अपनी सफलता के शिकार हो गए. समूह इतना बड़ा हो गया कि सब एक-दूसरे से जुड़े नहीं रह सके. 2014 में पांच बड़े मर्द चिम्पैंजी एक महीने में मर गए, जो समूह के बीच शांति बनाकर रखते थे. उनके जाने से रिश्ते टूटने लगे. ये चीज इंसानों में भी देखने को मिलता है.
दोस्त से दुश्मन: 2017 से शुरू हुआ खूनखराबा
2017 में तनाव चरम पर पहुंच गया. वेस्टर्न गुट के चिम्पैंजी सेंट्रल गुट के सबसे बड़े नर नेता (अल्फा मेल) पर हमला कर उसे घायल कर दिया. फिर 2018 से 2024 तक वेस्टर्न वाले लगातार हमले करते रहे. उन्होंने सेंट्रल गुट के 7 नर और 17 छोटे बच्चों को मार डाला. सेंट्रल गुट संख्या में ज्यादा था, लेकिन उसने कभी बदला नहीं लिया.
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वैज्ञानिक हैरान हैं - भोजन की कमी नहीं थी, फिर भी युद्ध क्यों? कारण था - पावर, इलाका और मादाओं पर कब्जा. वेस्टर्न वाले अपनी संख्या बढ़ाकर ज्यादा मादाओं तक पहुंचना चाहते थे. एक वैज्ञानिक ने कहा कि सेंट्रल वाले सोच रहे होंगे कि मादाएं छिन गईं, अब कुछ करना चाहिए. लेकिन उन्होंने गलत हिसाब लगाया और खुद ही मारे गए.
गोंबे का पुराना युद्ध: 50 साल पहले भी ऐसा ही हुआ था
यह पहली बार नहीं है. 1970 के दशक में तंजानिया के गोंबे जंगल में जेन गुडॉल ने भी यही देखा था. एक बड़ा समूह दो हिस्सों में बंट गया और चार साल तक जंग चली. एक गुट ने दूसरे गुट के 6 नर और एक मादा को मार डाला. उस समय वैज्ञानिकों ने चिम्पैंजी को केले खिलाए थे, इसलिए कुछ लोग कहते थे कि यह असली व्यवहार नहीं था. लेकिन नगोगो का अध्ययन बिना किसी खाने की मदद के हुआ. दोनों घटनाएं एक जैसी हैं - बड़े समूह का बंटवारा, पुराने दोस्तों का दुश्मन बनना और बिना किसी बड़े कारण के खूनखराबा.
इंसानी गृहयुद्धों की जड़ें चिंम्पैंजियों में क्यों?
यह कहानी सिर्फ चिंपैंजियों की नहीं, बल्कि इंसानों की भी है. चिम्पैंजी हमारे डीएनए का 98% हिस्सा साझा करते हैं. वे धर्म, भाषा, राजनीति या जाति के नाम पर नहीं लड़ते. फिर भी वे गृहयुद्ध कर लेते हैं. वैज्ञानिक रिचर्ड रंगहम कहते हैं कि आपको युद्ध के लिए विचारधारा की जरूरत नहीं है. यह हमारी जैविक प्रकृति में है.
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इंसानों में भाषा होने से बदला लेने की योजना बनाई जा सकती है, इसलिए हमारे युद्ध और लंबे और खूनी होते हैं. लेकिन जड़ एक ही है - समूह का बंटवारा, पावर की लड़ाई और ‘हम’ बनाम ‘वे’ का भाव. आज दुनिया में जहां-तहां गृहयुद्ध हो रहे हैं, वहां चिंपैंजियों की कहानी हमें याद दिलाती है कि हम भी सफलता के शिकार हो सकते हैं.
बोनोबो का सबक: हम लड़ नहीं, बल्कि साथ रह सकते हैं
चिम्पैंजी के अलावा हमारे एक और करीबी रिश्तेदार हैं - बोनोबो. वे भी समूह में रहते हैं, लेकिन कभी इतने खूनी गृहयुद्ध नहीं करते. वे सहयोग करते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं. वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारा विकास हमें युद्ध के लिए मजबूर नहीं करता. हम इंसान अजनबियों की भी मदद करते हैं.
नगोगो का अध्ययन हमें सिखाता है कि अगर हम सावधान रहे, तो अपने अंदर के चिम्पैंजी को काबू में रख सकते हैं. यह युद्ध अभी भी चल रहा है. 2025 और 2026 में भी नए हमले हुए हैं. 30 साल की मेहनत से वैज्ञानिकों ने साबित कर दिया - चिम्पैंजी भी अपनी सफलता के शिकार हो सकते हैं. और शायद इंसान भी. जंगल की यह कहानी शहरों के गृहयुद्धों को समझने का नया आईना बन गई है.
Source: AajTak
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