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संघ के 100 साल: बंगाल ही RSS का प्रेरणास्रोत, बंगाल ही बनी रही मुश्किल

संघ के 100 साल: बंगाल ही RSS का प्रेरणास्रोत, बंगाल ही बनी रही मुश्किल
बंगाल ने संघ को वैचारिक आधार दिया. कोलकाता में बालासाहब देवरस ने सबसे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी से संपर्क साधा, जो 1939 में हिंदू महासभा में शामिल हुए थे. उन्होंने मुखर्जी को आरएसएस शाखा में आमंत्रित किया और मुखर्जी ने अप्रैल 1940 में वहां का दौरा किया. यहीं से आरएसएस के साथ मुखर्जी के संबंध की शुरुआत हुई. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
यूं तो डॉ हेडगेवार ने अपनी मेडिकल की पढ़ाई ही कलकत्ता (आज कोलकाता) से की थी, वहीं से उनके जीवन को एक नई दिशा मिली, जब वो क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति से जुड़े. उनको कोर समूह में रखा गया और देश भर में फैले क्रांतिकारियों को अस्त्र, पत्र, नकदी आदि भेजने की जिम्मेदारी दी गई थी. साथ में वे कांग्रेस से भी जुड़े और फिर अपना भी एक क्रांतिकारी संगठन बनाने की कोशिश की, फिर बाद में समझ आया कि ना पूर्णतया अहिंसा ही ठीक है और ना ही एकदम हिंसा का पथ, उसकी यात्रा छोटी है, जबकि भारत को फिर से उसी वैभव पर लाना है, तो लड़ाई काफी लम्बी होगी, पीढ़ियों को लगना होगा. ऐसे में चूंकि बंगाल में उनका काफी समय युवावस्था में बीता था, तो वहां तो संघ का बीज बोना आवश्यक था ही. वैसे भी उनके वहां कई मित्र पहले से थे. डॉ हेडगेवार का वंदेमातरम आंदोलन, स्वामी विवेकानंद को आदर्श मानना, अरविंदो घोष से सम्पर्क, श्यामा प्रसाद मुखर्जी से करीबी रिश्ते और बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ घनिष्ठ सम्पर्क बंगाल में संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि का आधार बने. ऐसे में गुरु गोलवलकर को भी शुरूआती प्रेरणा रामकृष्ण मिशन से ही मिली थी.
1937 में जब हिंदू महासभा का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ तो उसके लिए ना केवल डॉ हेडगेवार आए बल्कि उनके साथ गुरु गोलवलकर, बाबा साहब आप्टे, दादाराव परमार्थ और बिट्ठल राव पतकी भी थे. जाहिर है उनकी तैयारी पूरी थी, वो एक पंथ दो काज का मन लेकर आए थे. ऐसे में पूरे प्रांत की जिम्मेदारी विट्ठल राव पतकी (या पाटकी) को दी गई. चूंकि उस वक्त गुरु गोलवलकर बंगाल में गुरु स्वामी अखंडानंद जी म़ृत्यु के बाद अभी लौटे ही थे, सो उन्हें बाद में विट्ठल राव जी का सहयोगी बना दिया गया. कहा जाता है कि विट्ठल राव पतकी अगर प्रचारक ना बनते तो एक बेहतरीन क्रिकेटर होते.
गुरु गोलवलकर जब बंगाल में स्वामी अखंडानंदजी के आश्रम से लौटे, तो उनके माता पिता भी समझ चुके थे कि उनका बेटा ना तो शादी करेगा और ना ही एक सामान्य जीवन जीएगा. ऐसे में डॉ हेडगेवार भी धीरे धीरे उन्हें अपने साथ प्रवासों पर ले जाने लगे थे. 1938 में उन्हें संघ के वर्ग की जिम्मेदारी दी गई, साथ ही कई राज्यों में उनके साथ प्रवास पर भी गए, उनके प्रिय शहर काशी भी. उसके बाद नागपुर से करीब 50 किमी दूर सिंदी नामक स्थान पर फरवरी 1939 में आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी. इस सिंदी बैठक का संघ के इतिहास में बड़ा महत्व है. इसका आयोजन संघ के एक वरिष्ठ स्वयंसेवक नानासाहेब तलातुले के आवास पर किया गया था. आरएसएस के संस्थापक डॉ. हेडगेवार, गुरु गोलवलकर , बाला साहेब देवरस, अप्पाजी जोशी, विट्ठलराव पतकी, तलातुले, तात्याराव तेलंग, बाबाजी सालोदकर और कृष्णराव मोहरिर आदि ने बैठक में भाग लिया. इस बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए, जिनका आरएसएस के कामकाज के तरीके पर लंबे समय तक प्रभाव पड़ा. इन फैसलों का आरएसएस की संरचना पर एक निश्चित प्रभाव पड़ा. उसी बैठक के बाद गुरु गोलवलकर और विट्ठलराव पतकी को बंगाल की जिम्मेदारी दी गई.
पहली शाखा गुरु गोलवलकर के नाम
यूं बंगालियों का अपना नववर्ष होता है, सो वहां दुर्गा पूजा तो जोरों से से होती है, लेकिन वर्ष प्रतिपदा या हिंदू नव वर्ष इतने जोर शोर से नहीं मनाया जाता. 22 मार्च 1939 वर्ष प्रतिपदा का ही दिन था, जिस दिन विट्ठल राव पतकी और गुरु गोलवलकर ने अविभाजित बंगाल की पहली शाखा की नींव रखी. यह आयोजन उत्तरी कोलकाता के मानिकतला इलाके में स्थित तेलकोल मठ नामक मैदान में हुआ था. यहीं से बंगाल में आरएसएस की यात्रा की औपचारिक शुरुआत हुई.
पहली शाखा खोलने के एक महीने बाद गोलवलकर नागपुर लौट आए, उन्हें संघ के 1939 के शिक्षा वर्ग का सर्वाधिकारी बना दिया गया था और उनकी जगह मधुकर दत्तात्रेय देवरस यानी बालासाहब देवरस को आरएसएस की संगठनात्मक गतिविधियों की देखरेख के लिए कलकत्ता भेज दिया. 1945 में दत्तोपंत बापूराव ठेंगड़ी को देवरस के स्थान पर कोलकाता भेजा गया. उनको 22 मार्च 1942 को केरल में कालीकट का प्रचारक बनकर भेज दिया गया था. तीन साल में उन्होंने संघ का काफी कार्य उस दुर्गम क्षेत्र में खड़ा कर दिया, तो 1945 में उन्हें वहां से कलकत्ता भेज दिया गया. उनका काम देखकर 1948 में उन्हें बंगाल के साथ साथ असम प्रांत का प्रचारक भी बना दिया गया. ये वो दौर था, जब गांधी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. ऐसे में दत्तोपंत को भी वापस आना पड़ा. 1949 में, संघ से प्रतिबंध हटने के बाद एकनाथ रानडे को पश्चिम बंगाल में गतिविधियों की देखरेख के लिए भेजा. ये सभी बाद में राष्ट्रीय स्तर पर आरएसएस के प्रमुख स्तंभ बने. लेकिन सभी के पास बंगाल जैसे कठिन प्रदेश में संघ कार्य़ करने का अच्छा खासा अनुभव हो गया था.
दत्तोपंत ठेंगड़ी के बाद कमान एकनाथ रानडे को
संघ को उत्तर-पूर्व के राज्यों की चिंता थी, ये राज्य सीमा पर थे और एक तरफ वहां ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां बढ़ गई थीं, दूसरे पूर्वी पाकिस्तान से लगे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ भी बढ़ती जा रही थी. एकनाथ रानडे को पूरे पूर्वांचल की जिम्मेदारी दी गई, जिसमें आसाम, पश्चिम बंगाल, उडीसा भी शामिल थे. उनका ये काम आसान नहीं था, भाषा एक बड़ी समस्या थी. बंजर जमीन पर लहलहाती फसलों की सपना देख रहे वो, लेकिन काफी हद तक उन्होंने काम को आसान किया. उनके जाते ही पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी. एकनाथ रानडे ने कलकत्ता को अपना केन्द्र बनाया था. रानडे ने विस्थापितों की सहायता के लिए ‘वास्तुहारा सहायता समिति' बनाई और उसके जरिए हजारों तम्बू, शामियाने लगाकर उनको शऱण दी, महीनों तक उनके भोजन, वस्त्र, दवाइयों आदि का इंतजाम किया. इतना ही नहीं वो कुछ काम कर सकें, इसके लिए उनके लिए एक अस्थाई प्रशिक्षण संस्थान की भी स्थापना की गई.
उनके प्रयास रंग लगाए औऱ पूर्वांचल में संघ के कदम मजबूत होने लगे. 1953 में रानडे को एक नई जिम्मेदारी अतिरिक्त तौर पर दी गई, वो था संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख का पद. जिसके लिए उन्होंने देश भर में कार्यकर्ताओं के कार्य़कमों में जाना शुरू किया, 1954 में वर्धा के निकट सिंदी में जिला प्रचारकों का 15 दिन का एक विशेष शिविर भी आयोजित किया. लेकिन कुछ समय बाद ही गुरु गोलवलकर के दोनों करीबी भैयाजी दाणी और बाला साहब देवरस बीमार रहने लगे. इन्हीं दिनों में बाला साहब कुछ समय के लिए संघ कार्य से दूर भी हो गए थे. सो गुरु गोलवलकर के सामने मुश्किल थी, कि उतना योग्य, अनुभवी व निष्ठावान कोई हो जो उनकी जगह ले, खोज खत्म हुई एकनाथ रानडे पर जाकर., एकनाथ रानडे को प्रतिनिधि सभा ने संघ का सरकार्यवाह चुन लिया.
विदेश में पढ़ाई का प्रस्ताव ठुकराकर बंगाल लौटे अमल कुमार बसु
ऐसे में जबलपुर रहने के दौरान एकनाथ रानडे के सम्पर्क में धार (एमपी) में पैदा हुए अमल कुमार बसु से हो गए थे. वो पैदा तो धार में हुए थे लेकिन उनके पूर्वज बंगाल के 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर में जमींदार थे. पिताजी धार में वकील थे. इतने मेधावी थे कि एक बार में दो कक्षाएं बढ़ा दी जाती थीं. तीन विषयों में एमए किया, एलएलबी प्रथम श्रेणी में पास की, विदेश में पढने का प्रस्ताव ठुकरा कर संघ के प्रचारक बने गए. भारत छोड़ो आंदोलन और संघ पर प्रतिबंध (1948) के दौरान जेल भी गए. एकनाथ रानडे के आग्रह पर उन्हें बंगाल भेज दिया गया. तब वे जबलपुर के विभाग प्रचारक थे. बंगाल में उन्हें सह-प्रांत प्रचारक बनाया गया और उसके बाद प्रांत प्रचारक.
ये वो समय था, जब प्रतिबंध के बाद संघ पर आर्थिक संकट आ गया था, सो प्रचारकों से कहा गया था कि खुद के खर्च निकालने के लिए कोई ना कोई आजीविका के साधन भी ढूंढ़ लें. अमल कुमार बसु बीएड, एमएड भी कर चुके थे, बैरकपुर के बीटी कॉलेज में पढ़ाने लगे और संघ कार्य भी देखते रहे. आगे वो उसी कॉलेज में प्राचार्य भी बन गए. संघ कार्य़ालय पर रहते हुए भी वे 1961 में प्रांत कार्यवाह, 1979 में प्रांत संघचालक भी बने, शायद वे पहले होंगे जो प्रांत प्रचारक, कार्यवाह और संघचालक तीनों पदों पर रहे हों. विद्या भारती का भी काम उन्होंने बहुत बढाया और पूर्व क्षेत्र के अध्यक्ष रहे.
पहली शाखा के ये दो प्रचारक आजीवन संघ के काम में जुटे रहे
उसी शाखा में मुख्य शिक्षक की जिम्मेदारी मिली 16 वर्षीय छात्र जॉयदेव घोष को मिली थी. 2013 में अपनी मृत्यु तक वो संघ कार्य विस्तार में ही लगे रहे, इस दौरान तमाम तरह की बाधाएं आईं, कम्युनिस्ट शासन से लेकर टीएमसी राज तक जॉयदेव घोष कितनी भी परेशानियों के बावजूद संघ कार्य से विमुख नहीं हुए. उन्हीं के साथ पहली शाखा के साथी थे कालीदास बसु यानी काली दा. जब संघ से जुड़े तब कक्षा 9 के छात्र थे, पहला बौद्धिक वे जीवन भर नहीं भुला पाए. ये दोनों ही स्वयंसेवक संघ के तीनों सरसंघचालकों से वहां मिलते रहे क्योंकि ड़ॉ हेडगेवार भी वहां आते जाते रहे थे. बाद में गुरु गोलवलकर व बालासाहब देवरस भी सरसंघचालक बने. काली दा कोलकाता हाईकोर्ट में सीनियर वकील बन गए थे. ऐसे में बाद में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के मार्गदर्शक भी बने.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नवद्वीप में विस्तारक बनाकर भेजा गया था. वहीं उन्हें बाद में जिला प्रचारक बनाया गया. 1949 में उन्हें महानगर प्रचारक बनाकर कलकत्ता बुला लिया गया. 1952 तक प्रचारक रहे फिर वकालत शुरू कर दी. ये माना जाता है कि 1977 में स्थापित नेशनल लॉयर्स फोरम ही बाद में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद का आधार बन गया था. वैवाहिक जीवन में प्रवेश के बाद भी अलग अलग संघ के अलग अलग संगठनों को सहयोग देते रहे, उनकी पत्नी प्रतिमा बसु राष्ट्र सेविका समिति की प्रांत संचालिका रहीं. 2010 तब जब तक वे जिंदा रहे बंगाल में संघ की प्रमुख आवाजों में उनकी गिनती होती रही.
बंगाल जैसी बाधाएं संघ कार्य में कहीं नहीं आईं
कोलकाता पहुंचने के बाद बालासाहब देवरस ने सबसे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी से संपर्क साधा, जो 1939 में हिंदू महासभा में शामिल हुए थे. उन्होंने मुखर्जी को आरएसएस शाखा में आमंत्रित किया और मुखर्जी ने अप्रैल 1940 में वहां का दौरा किया. यहीं से आरएसएस के साथ मुखर्जी के संबंध की शुरुआत हुई, जो अगले नौ वर्षों तक जारी रहा, जिस दौरान उन्होंने महासभा का नेतृत्व किया. उसके बाद जब गांधी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा और मुखर्जी ने नेहरू केबिनेट से इस्तीफा दिया, तब तक गुरु गोलवलकर ये समझ चुके थे कि राजनीति में उनकी बात रखने वाला कोई तो होना चाहिए. ऐसे में उन्होंने अपने पांच प्रचारक मुखर्जी को दिए और जनसंघ की शुरूआत हो गई.
लेकिन मुखर्जी की कश्मीर में मौत संघ के लिए एक बड़ा झटका साबित हुई. जनसंघ की गति धीमी हुई लेकिन उसका असर बंगाल में संघ कार्य पर भी पड़ा. उससे पहले जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन डे' व विभाजन दंगों में संघ ने अपने कई स्वयंसेवकों को खोया. सुहारावर्दी की सरकार में मौत का जो तांडव हुआ, वो सबने देखा, जहां जहां संघ मजबूत था, वहां हिंदू बचे रहे, लेकिन प्रशासन के सहयोग मिलने के चलते शुरूआती 2 दिन मुस्लिम दंगाई हावी रहे. धीरे धीरे संघ के स्वयंसेवकों की मेहनत और निडरता से बाजी पलटती चली गई.
लेकिन ना बंगाल में और ना ही केन्द्र में, सरकार तो थी ही नहीं, एक एक करके जो न्याय की बात करते थे, संघ को समझते थे, वो काल का ग्रास बनते चले गए. उनमें गांधीजी, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि शामिल थे. इसका सबसे ज्यादा असर बंगाल में संघ की गति पर हुआ और संघ के लिए केवल बंगाल ही नहीं था, बल्कि पूरा पूर्वोत्तर उन दिनों ईसाई गतिविधियों का शिकार था. बंगाल में लम्बे कम्युनिस्ट शासन ने लगातार संघ कार्य में बाधाएं डालीं, अलग अलग आंदोलनों, घटनाओं में जान गंवाने वाले संघ के स्वयंसेवकों की सूची काफी लम्बी है.
उसके बाद इमरजेंसी में लगे प्रतिबंध ने भी संघ का कम नुकसान नहीं किया. हालांकि विश्व हिंदू परिषद और विद्या भारती जैसे संगठनों के विस्तार ने संघ को बंगाल में एक तरह से सहारा ही दिया. तपन घोष जैसे कई स्वयंसेवक भी थे, जो कई दशक तक संघ कार्य करके भी निराश होकर बंगाल में संघ का साथ छोड़ गए. कम्युनिस्ट शासन के खात्मे के बाद और मोहन भागवत के संघ प्रमुख के तौर पर जिम्मेदारी संभालने के बाद से ही स्थिति में परिवर्तन साफ नजर आने लगा है. बीजेपी ने भी वहां अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. सोशल मीडिया के प्रसार के चलते लोगों की भी समझ आने लगा है कि उनकी भलाई किसमें है. सही तथ्यों को जानकर अब युवा पीढ़ी भी अपनी जिम्मेदारी महसूस करने लगी है. संघ ने भी स्वामी विवेकानंद की जन्म शताब्दी और 150वीं जयंती को बहुत भव्य आयोजनों से मनाया, केन्द्र सरकार भी इस बार वंदेमातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर कई आयोजन कर रही है, गणतंत्र दिवस की थीम भी वंदेमातरम पर है.
पिछली कहानी: विभाजन से 1984 दंगों तक संघ का जोर सिखों से मजबूत रिश्तों पर रहा
Source: AajTak
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देबाशीष मोहंती का करियर इस बात की मिसाल है कि कभी-कभी टैलेंट और शानदार रिकॉर्ड होने के बावजूद इंटरनेशनल क्रिकेट में लंबे समय तक मौके नहीं मिलते. भारतीय टीम के लिए उनका सफर भले ही छोटा रहा, लेकिन उनके नाम दर्ज कुछ रिकॉर्ड आज भी उन्हें भारतीय क्रिकेट के सबसे अनोखे तेज गेंदबाजों में शामिल करते हैं.देबाशीष मोहंती का करियर इस बात की मिसाल है कि
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शामली में हरियाणवी सिंगर अंकित बालियान की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अब इस हत्याकांड का सीसीटीवी फुटेज सामने आया है, जिसमें चार बदमाश जिम से निकलते वक्त सिंगर पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाते और फिर फरार होते दिख रहे हैं. यह पूरी घटना कुछ ही सेकंड में हो जाती है.शामली में हरियाणवी सिंगर अंकित बालियान की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अब इस हत्याकांड
13 hours ago
नेपाल की बाढ़ ने दिखाई अपनी असली ताकत! तेज बहाव में सिर्फ पानी और मलबा ही नहीं, बल्कि भारी-भरकम पत्थर भी बहता नजर आया. कैमरे में कैद वीडियो में नदी की तेज धारा का खतरनाक रूप साफ दिखाई दे रहा है. नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें पानी के तेज बहाव के साथ एक विशाल पत्थर भी बहता दिखाई दे रहा है. पत्थर पानी और मलबे के साथ आगे
13 hours ago
FDA ने मेटास्टैटिक पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज के लिए नई दवा रासोंक को मंजूरी दी है, जो खासतौर पर उन मरीजों के लिए है जिनका पहले इलाज हो चुका है या जो सामान्य कीमोथेरेपी नहीं ले सकते है. पैंक्रियाज में होने वाले कैंसर को पैंक्रियाटिक कैंसर कहते हैं. इससे अधिकतर मामले आखिरी स्टेज में सामने आते हैं. ऐसे में मरीजों की जान बचाना बहुत मुश्किल हो जाता
13 hours ago
तिब्बत में हुए लैंडस्लाइड और भोटेकोशी नदी में आए बाढ़ के बाद नेपाल हाल के सबसे बड़े प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है. लेकिन खतरा अभी कायम ही है. चीन के जल मंत्रालय ने कहा है कि हिमालयी क्षेत्र में दो नदियों के संगम के पास एक एक झील बन गया है यहां पानी की इतनी मात्रा जमा हो रही है अगर ये फट जाए तो आने वाली तबाही और भी बड़ी होगी.तिब्बत में हुए
13 hours ago
टीवीएस ने जुपिटर का नया वर्जन लॉन्च किया है. कंपनी ने 110 सीसी के इंजन वाले स्कूटर को डुअल टोन स्पेक्ट्रल कलर ऑप्शन में लॉन्च किया है. इसमें कई फीचर्स भी जोड़े गए हैं. नया जुपिटर बेहतर सीट और यूएसबी टाइप-सी जैसे फीचर के साथ आता है. इसमें पहले वाला ही इंजन मिलता है. आइए जानते हैं इसकी खास बातें.टीवीएस ने जुपिटर का नया वर्जन लॉन्च किया है. कंपनी ने 110
13 hours ago
बिजनौर के धामपुर में एक दर्दनाक सड़क हादसा हुआ. तेज रफ्तार ट्रक ने पहले स्कूटी सवार को टक्कर मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया और मौके से भागने लगा. कुछ दूर चलने के बाद ट्रक कैंटर से भिड़ गया. इसके बाद दोनों वाहनों में आग लग गई. ट्रक चालक नदीम आग में फंस गया और उसकी जिंदा जलकर मौत हो गई. वहीं, हादसे में घायल स्कूटी सवार ने भी दम तोड़ दिया.बिजनौर के
1 days ago
समय रैना का यह बयान इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि 2025 में उनके शो इंडियाज गॉट लेटेंट से जुड़े विवाद के बाद महाराष्ट्र साइबर सेल ने उनसे पूछताछ की थी. उस विवाद के दौरान समय को अपने शो के एपिसोड हटाने पड़े थे और बाद में वह जांच के सिलसिले में मुंबई पहुंचे थे.समय रैना का यह बयान इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि 2025 में उनके शो इंडियाज गॉट लेटेंट से जुड़े विवाद
1 days ago
मध्य प्रदेश के अशोकनगर में चंदेरी पुलिस ने फर्जी IAS अधिकारी बनकर लोगों को नौकरी दिलाने का झांसा देने वाले भाई-बहन को गिरफ्तार किया है. आरोप है कि दोनों ने सरकारी नौकरी और अच्छी सैलरी का लालच देकर पीड़ितों से कुल 9 लाख 80 हजार रुपये ठग लिए. पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने खुद को अफसर बताकर लोगों का भरोसा जीता और नौकरी के नाम पर पैसे के साथ जरूरी
1 days ago