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122 दिन बाद कैसे वेंटिलेटर से जिंदा लौटा लक्षित

3 बार हार्ट अटैक, शरीर में लकवा, 122 दिन बाद वेंटिलेटर से 'जिंदा' लौटा लक्षित... सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने किया चमत्कार
वेंटिलेटर का नाम सुनकर ही रूह कांप जाती है. फिर भले ही कोई बड़ा निजी अस्पताल हो. वेंटिलेटर से मरीज का लौटना बहुत बड़ी बात मानी जाती है. फिर सरकारी अस्पताल की बात हो तो यहां मरीजों की भीड़ तो कभी और तमाम दिक्कतें.. सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को अक्सर लाचारी की नजर से देखा जाता है. लेकिन दिल्ली के इस सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने अपनी रातों की नींद और सुख-चैन को दांव पर लगाकर एक ऐसा 'चमत्कार' कर दिया है, जिसे सुनकर पत्थर दिल भी रो पड़े.
कहते हैं कि जब जिंदगी और मौत के बीच की डोर बेहद पतली हो जाए, तो वहां केवल दो ही चीजें काम आती हैं, डॉक्टरों का सेवाभाव और अपनों की अटूट उम्मीद. दिल्ली के स्वामी दयानंद अस्पताल (SDNH) के आईसीयू (ICU) वार्ड में पिछले कुछ महीनों में एक ऐसा ही चमत्कार देखने को मिला, जिसने चिकित्सा जगत और मानवीय हौसले की एक नई मिसाल पेश की है.
एक 14 साल का बच्चा, जो पूरी तरह से पैरालिसिस (लकवे) की स्थिति में, बिना सांस लिए अस्पताल में भर्ती हुआ था, जिसने इलाज के दौरान तीन बार 'कार्डियक अरेस्ट' (दिल का दौरा) झेला और जिसका दिल धड़कना बंद हो चुका था, वह आज न सिर्फ जीवित है बल्कि अपने पैरों पर खड़ा होकर मुस्कुराते हुए अपने घर वापस लौट चुका है.
यह कहानी है लक्षित की, जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में गिलेन-बैरे सिंड्रोम (Guillain-Barré Syndrome- GBS के सबसे खतरनाक वेरिएंट एक्यूट मोटर एक्सोनल न्यूरोपैथी (AMAN) ने जकड़ लिया था.
जब पैरों ने साथ छोड़ा और थमने लगीं सांसें
aajtak.in से बातचीत में लक्षित की मां लक्ष्मी ने बताया, ' बेटे की बीमारी की शुरुआत बेहद सामान्य तरीके से हुई थी. कमजोरी शुरू होने के करीब दो हफ्ते पहले उसे साधारण दस्त हुए थे.' सच पूछिए तो परिवार को जरा भी अंदाजा नहीं था कि एक साधारण सा दिखने वाला पेट का संक्रमण शरीर के इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा तंत्र) को इतना हिंसक बना देगा कि वह खुद अपनी नसों को नष्ट करने लगेगा.
लक्षमी ने बताया कि धीरे-धीरे लक्षित के पैरों की ताकत गायब होने लगी. वह लड़खड़ाया, गिरा और फिर खड़ा नहीं हो सका. देखते ही देखते पैरालिसिस पैरों से होता हुआ हाथों और फिर छाती की मांसपेशियों तक पहुंच गया. लक्षित ने सांस लेना बंद कर दिया. उसके फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया था.
हमलोग उसे तुरंत 26 अक्टूबर 2025 को जीटीबी (GTB) अस्पताल ले गए जहां उसे भर्ती कराया गया, जहां स्थिति बिगड़ने पर डॉक्टरों ने उसके गले में सांस की नली डालने के लिए ट्रैकियोस्टॉमी (Tracheostomy) की. डॉक्टरों ने उसे बचाने के लिए बेहद महंगा इंजेक्शन भी दिया. ये इंजेक्शन और दवा में परिवार ने 30 हजार रुपये खर्च कर दिए जो एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के लिए एक बड़ी रकम है. लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ तो वेंटिलेटर सपोर्ट के साथ 4 नवंबर 2025 को उसे स्वामी दयानंद अस्पताल (SDNH) के आईसीयू में ट्रांसफर कर दिया गया.
₹10-15 हजार कमाने वाले परिवार के लिए फरिश्ता बना सरकारी अस्पताल
निजी अस्पतालों में चार से पांच महीने तक आईसीयू और वेंटिलेटर केयर का खर्च लाखों रुपये में आता है. लक्षित के माता-पिता बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. पिता मार्केट से सिलाई का काम लेकर 15 से 20 हजार रुपये कमाते हैं, जिसमें तीन बच्चे बीवी वाले परिवार का गुजारा मश्किल से होता है. मां लक्ष्मी और उसकी बड़ी बेटी पिछले 4 महीनों से अस्पताल की चौखट पर दिन-रात एक किए हुए थीं.
अस्पताल के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने aajtak.in को बताया कि एक जिला स्तरीय अस्पताल के लिए इतने लंबे समय तक वेंटिलेटर केयर देना एक बड़ी चुनौती होती है. हमारे सामाजिक परिवेश में जहां गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के पास निजी अस्पतालों में जाने की आर्थिक सबलता नहीं होती, वहां हमारी कोशिश थी कि इस बच्चे को हर संभव आईसीयू केयर मुफ्त में मिले. स्वामी दयानंद अस्पताल में सभी संसाधन पूरी तरह से मुफ्त थे, जिसने इस परिवार को टूटने से बचा लिया.
कोविड काल के वेंटिलेटर और डॉ. रंजीत चटर्जी की 'जंग'
डॉ. बिष्ट ने विशेष रूप से आईसीयू इंचार्ज डॉ. रंजीत चटर्जी की तारीफ की. उन्होंने कहा कि डॉ. चटर्जी, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आईसीयू केयर के लिए जाने जाते हैं, उनकी देखरेख में लक्षित को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया.
दिलचस्प बात यह है कि लक्षित को जिस वेंटिलेटर पर रखकर नया जीवन मिला, वह वेंटिलेटर कोविड-19 महामारी के दौरान सांसद मनोज तिवारी के सांसद विकास निधि (MP LAD Fund) से अस्पताल को मिला था. ये वेंटिलेटर आज भी बिना रुके काम कर रहे हैं और लक्षित जैसे न जाने कितने मासूमों के फेफड़ों को संजीवनी दे रहे हैं.
मौत से सामना: जब तीन बार रुका बच्चे का दिल
डॉ बिष्ट ने बताया कि लक्षित का इलाज आसान नहीं था. उसके 122 दिनों के सफर में कई ऐसे मोड़ आए जब डॉक्टरों की सांसें भी थम गईं. जानिए कैसे हुआ इलाज.
पहला बड़ा संकट (दिन 12-15): अब तक बच्चे के शरीर में संक्रमण फैल चुका था. सांस की नली में खतरनाक और दवाओं को बेअसर करने वाले 'Acinetobacter baumannii' बैक्टीरिया का हमला हुआ. नली से खाना देने के सारे प्रयास विफल हो रहे थे और उसे नसों के जरिए पोषण (Total Parenteral Nutrition) देना पड़ रहा था.
16 नवंबर 2025 (शाम 04:20 बजे): यह वो भयावह दिन था जब आईसीयू में अचानक अलार्म बज उठे. लक्षित का दिल धड़कना बंद हो गया. उसे गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया. डॉक्टर रंजीत चटर्जी और उनकी टीम ने बिना एक पल गंवाए तुरंत CPR (Cardiopulmonary Resuscitation) देना शुरू किया. डॉक्टरों की जिद और त्वरित सूझबूझ से लक्षित के दिल ने दोबारा धड़कना शुरू कर दिया. इस तरह के कार्डिएक अरेस्ट से लक्षित को डॉक्टरों ने दो से तीन बार सीधे मौत के मुंह से वापस खींचा.
दिन 22-26: जब संक्रमण बढ़ता गया. इस बार 'Klebsiella' और 'Pseudomonas' जैसे घातक बैक्टीरिया ने हमला किया. लगातार लेटे रहने के कारण पैरों की मांसपेशियां मुड़ने लगी थीं (Foot contractures) और पीठ पर बेड सोर (घाव) होने लगे थे.
दिन 36-38: लक्षित को मिर्गी के गंभीर दौरे (Seizures) पड़ने शुरू हो गए, जिसके बाद IHBAS अस्पताल के न्यूरोलॉजिस्ट की मदद ली गई.
5 विभागों का बेजोड़ तालमेल: ऐसे मिली फतह
डॉ बिष्ट कहते हैं कि लक्षित की रिकवरी किसी एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि अस्पताल के 5 अलग-अलग विभागों के बेजोड़ तालमेल का नतीजा थी. जानिए किस विभाग ने क्या रोल निभाया.
1. पीडियाट्रिक और आईसीयू टीम: लगातार 24 घंटे निगरानी, खतरनाक इन्फेक्शन पर काबू पाना और कार्डियक अरेस्ट के दौरान CPR देकर जान बचाना.
2.ENT और एनेस्थीसिया टीम: सांस की नली (Tracheostomy Tube) का सुरक्षित प्रबंधन और उसे समय-समय पर बदलना.
3. फिजियोथेरेपी और ऑर्थोपेडिक टीम: पैरों को हमेशा के लिए मुड़ने और विकृत होने से बचाने के लिए आईसीयू में ही रोजाना कसरत कराना और स्पेशल स्प्लिंट्स (जूते) लगाना.
4. डर्मेटोलॉजी और सर्जरी विभाग: बेड सोर (घावों) को ठीक करने के लिए विशेष एयर मैट्रेस और ड्रेसिंग का इंतजाम करना.
5. स्पीच और ऑक्यूपेशनल थेरेपी: लंबे समय से बंद पड़ी आवाज को वापस लाने के लिए स्पीच थेरेपी देना और हाथों के बारीक मूवमेंट को फिर से चालू करना.
वेंटिलेटर हटा और अस्पताल से खुद चलकर गया मासूम
लक्षित के इलाज का चौथा फेज (दिन 66 से 120) सबसे सुखद रहा. धीरे-धीरे संक्रमण काबू में आया और उसे वेंटिलेटर से हटाकर सीधे ऑक्सीजन सपोर्ट (T-Piece) पर लाया गया.
अस्पताल के डॉक्टरों ने दिन 84 से 95 के बीच उसकी ट्रैकियोस्टॉमी नली को बंद करने का ट्रायल शुरू किया. इसके लिए एक खास 'फेनेस्ट्रेटेड ट्यूब' लगाई गई ताकि वह बोल सके. जब महीनों बाद लक्षित के मुंह से पहली आवाज निकली, तो उसकी मां लक्ष्मी की आंखों से आंसू छलक पड़े. लक्ष्मी ने कहा कि जब वह अस्पताल आया था, वह पूरी तरह से निर्जीव शरीर की तरह था. न बोल सकता था, न हिल सकता था. लेकिन डॉक्टरों ने हार नहीं मानी. आज मेरा बच्चा खुद खड़ा हो पा रहा है. हम इस अस्पताल और यहां के डॉक्टरों का अहसान कभी नहीं भूल सकते.
Source: AajTak
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