महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से एक दर्दनाक घटना की जानकारी सामने आई है, जहां युवा ने iPhone के चलते जान दे दी. इसके बाद उसके पिता की भी जान चली गई और माता का भी निधन हो गया. अब सवाल आता है कि iPhone को लेकर लोगों में इतना क्रेज क्यों है. iPhone का क्रेज किसी से छिपा नहीं है. क्या आप जानते हैं कि इसकी दीवानगी की वजह से एक परिवार उजड़ गया. दरअसल, शुक्रवार को एक
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SIM Card Rules change: कल यानी 24 अगस्त से सिम कार्ड को लेकर नियम में बदलाव होने जा रहा है. अगर कोई शख्स सिम खरीदने जा रहा है तो उसको न्यू सिम कनेक्शन देने से मना भी किया जा सकता है. दरअसल, अगर आपके पास पहले से निर्धारित कोटा के तहत 9 सिम खरीद चुके हैं, तो नई सिम को जारी नहीं किया जाएगा. आइए इसके बारे में डिटेल्स में जानते हैं.SIM Card Rules change: कल यानी 24 अगस्त से सिम कार्ड को
सैमसंग के स्मार्टफोन की कीमत में इजाफा हो गया है, जो Galaxy A सीरीज का हिस्सा है. इसमें Samsung Galaxy A57 और Samsung Galaxy A37 के नाम शामिल हैं. यहैं हैंडसेट की कीमत में मैक्सिमम 4800 रुपये का इजाफा हुआ है. सैमसंग के स्मार्टफोन की कीमत में इजाफा हुआ है, जिसके बाद गैलेक्सी A सीरीज के कुछ हैंडसेट की कीमतत में 4800 रुपये तक का इजाफा हुआ है. इस बदलाव में सैमसंग गैलेक्सी A सीरीज के
भारत में एक नया पावर बैंक लॉन्च हो गया है, जिसमें वायर्ड और वायरलेस दोनों चार्जिंग का सपोर्ट दिया गया है. इसमें मैक्सिमम 45W तक का वायर्ड फास्ट चार्जिंग सपोर्ट है और 15W का वायरलेस चार्जिंग सपोर्ट दिया गया है. आइए इसके बारे में डिटेल्स में जानते हैं. GM Modular ने नया प्रोडक्ट लॉन्च किया है, जो असल में एक प्रीमियम पावर बैंक है. कंपनी ने यूजर्स की जरूरत को
Sim card Rules change: भारत सरकार का दूरसंचार विभाग (DoT) SIM Card को लेकर सख्ती बरतने जा रहा है. 24 अगस्त से नियम सख्ती से लागू होगा, जिसमें एक शख्स तय नियम से अधिक सिम कार्ड को खरीद नहीं पाएंगे. सरकारी पोर्टल की मदद से आप खुद चेक कर सकेंगे कि आपके नाम पर कितने सिम कार्ड हैं.Sim card Rules change: भारत सरकार का दूरसंचार विभाग (DoT) SIM Card को लेकर सख्ती बरतने जा रहा है. 24 अगस्त से नियम सख्ती से
अमेरिका में टिकटॉक ने 3828 करोड़ रुपये का सेटलमेंट किया है. टिकटॉक ने यह समझौता एक पुराने केस में किया है, जिसमें टिकटॉक पर कई गंभीर आरोप लगे थे. अब वे केस खत्म कर दिए जाएंगे. आइये इसके बारे में डिटेल्स में जानते हैं. बच्चों की प्राइवेसी से जुड़े एक केस में टिकटॉक (TikTok) को अब 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर (3828 करोड़ रुपये) देने होंगे. टिकटॉक ने समझौता अमेरिका के
चीन में रोबोट ओलंपिक से कुछ रोबोट का ट्रायल हुआ है. ट्रायल के दौरान बहुत से रोबोट में टेक्निकल खामी सामने आई और वे जमीन पर जा गिरे. कुछ रोबोट तो टीवार से टकरा गए और खराब होकर जमीन पर गिर पड़े. सोशल मीडिया पर कुछ ह्यूमनॉइड रोबोट के वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें वह रनिंग ट्रैक पर तेजी स्पीड में दौड़ते-दौड़ते एक दीवार से जा टकराए. फिर वह जमीन पर ढेर
1947 में मिली आजादी

1947 में मिली आजादी, लेकिन 2026 में क्या हमारी डिजिटल जिंदगी गुलाम है?
इंडिपेंडेंस डे के मौके पर हम सब को एक सवाल खुद से पूछना चाहिए. क्या इंटरनेट पर वाकई आप आजाद हैं? जवाब पेनफुल हो सकता है. आपके खुद के ही डेटा पर आपका कितना कंट्रोल है? सोचा है? अगर नहीं, तो सोचिए.
15 अगस्त हमें उस आजादी की याद दिलाता है जो भारत ने 1947 में हासिल की थी. उस समय सवाल था कि देश पर राज कौन करेगा और देश आगे कैसे बढ़ेगा. आज 2026 में हमारे सामने आजादी का एक नया सवाल खड़ा है. हमारी डिजिटल जिंदगी पर असली कंट्रोल किसका है? ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया के दौर में लोगों की आजादी ज्यादा ही मिल गई. कोई भी वीडियो बना कर करोड़ों यूजर्स तक अपनी बात रख सकता है. लेकिन क्या सच में ये डिजिटल आजादी है या गुलामी? आइए विस्तार से समझते हैं.
इंस्टाग्राम पर ही पिछले कुछ समय से रील्स वायरल हो रही हैं. इन रील्स में महात्मा गांधी, भगत सिंह, अब्दुल कलाम जैसे कई फ़्रीडम फाइटर्स का AI वर्जन दिख रहा है, सामने कुछ लोग बैठे हैं और अमेरिकी कंपनी के लिए दिन रात काम कर रहे हैं. मजाकिया अंदाज़ में लिखा होता है - ‘आजादी के दिन भी हम अंग्रेजों के लिए काम कर रहे हैं, क्या इसलिए गांधी जी ने आजादी दिलाई थी’. बहरहाल ये तो एक सटायर है, लेकिन असली सच्चाई क्या है? आइए इंडिपेंडेंस डे के मौके पर थोड़ी डिजिटल आजादी या गुलामी से पर्दा हटाया जाए.
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने आजादी तो दी, लेकिन...
स्मार्टफोन और इंटरनेट ने हमें पहले से कहीं ज्यादा ताकत दी है. हम सेकेंडों में दुनिया से जुड़ सकते हैं, अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचा सकते हैं, घर बैठे पैसे भेज सकते हैं और AI से अपने काम करा सकते हैं. लेकिन इसी सर्विस के साथ हमने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा टेक कंपनियों को भी सौंप दिया है. हम क्या देखते हैं, क्या खोजते हैं, कहां जाते हैं और किस चीज में दिलचस्पी लेते हैं, इसका बड़ा हिस्सा अब डिजिटल रिकॉर्ड बन चुका है. तो फिर सवाल यही है, मॉडर्न टेक के बीच हम कितने आजाद हैं?
आज से कुछ दशक पहले की जिंदगी याद कीजिए. किसी दूसरे शहर में रहने वाले रिश्तेदार से बात करनी है तो फोन का इंतजार करना पड़ता था. विदेश में रहने वाले किसी शख्स से बात करना आसान नहीं था. किसी घटना की जानकारी चाहिए तो अगले दिन का अखबार देखना पड़ता था. किसी सरकारी दफ्तर का काम है तो लाइन में लगना पड़ता था. पैसे भेजने हैं तो बैंक जाना पड़ता था.
आज वही काम फोन की स्क्रीन पर कुछ सेकेंड में हो जाता है. एक स्मार्टफोन हमारी जेब में दुनिया लेकर घूमता है. गूगल पर दुनिया की जानकारी है. यूट्यूब पर किसी भी विषय को सीखने के लिए हजारों वीडियो हैं. वॉट्सऐप ने दूरी को लगभग खत्म कर दिया है. सोशल मीडिया ने आम आदमी को अपनी बात कहने का ऐसा मंच दिया है, जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले मुश्किल थी. UPI ने पैसे भेजने का तरीका बदल दिया है.
टेक्नोलॉजी ने बढ़ाए विकल्प
यानी टेक्नोलॉजी ने हमें सिर्फ सुविधा नहीं दी. उसने हमारे पास मौजूद विकल्प बढ़ाए हैं. एक छोटा दुकानदार बिना बड़ी दुकान के अपना सामान ऑनलाइन बेच सकता है. एक छात्र दुनिया के किसी भी कोने से पढ़ाई की सामग्री हासिल कर सकता है. किसी छोटे शहर का पत्रकार अपने फोन से वीडियो बनाकर लाखों लोगों तक पहुंच सकता है. एक आम नागरिक किसी मुद्दे पर अपनी बात सीधे लोगों तक पहुंचा सकता है.
यह भी एक तरह की आजादी है. लेकिन इसी कहानी का दूसरा हिस्सा ज्यादा दिलचस्प है.
क्या अपने ही डेटा को लेकर आजाद हैं हम?
सोशल मीडिया ने हमें बोलने की आजादी दी, लेकिन जिस मंच पर हम बोल रहे हैं, उसके नियम हमारे हाथ में नहीं हैं. हम पोस्ट लिख सकते हैं, वीडियो डाल सकते हैं, किसी मुद्दे पर अपनी राय रख सकते हैं, लेकिन आखिर में यह तय करने का अधिकार प्लेटफॉर्म के पास है कि हमारी पोस्ट कितने लोगों तक पहुंचेगी. कौन सा वीडियो ज्यादा दिखेगा, कौन सा कम दिखेगा और कौन सा कंटेंट हटाया जाएगा, इसमें प्लेटफॉर्म के बनाए सिस्टम की बड़ी भूमिका होती है.
ताजा उदाहरण जंतर मंतर स्टूडेंट प्रोटेस्ट का ही है. दिल्ली के प्रोटेस्ट को इंस्टाग्राम के एल्गोरिद्म ने जम कर प्रोमोट किया. लेकिन रांची के स्टूडेंट प्रोटेस्ट को इंस्टाग्राम के एल्गोरिद्म ने दबा दिया. भले ही आपको ये लगता है कि इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रीच किसी को भी मिल सकती है. लेकिन ये ग़लत है. रीच वैसे ही कंटेंट को मिलती है जिसे इंस्टाग्राम पुश करना चाहता है.
यानी हमारी आवाज हमारी है, लेकिन उसकी पहुंच पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं है. और इसके साथ एक दूसरा बदलाव भी हुआ है. इंटरनेट ने हमारे बारे में बहुत कुछ जानना शुरू कर दिया है.
आप गूगल पर क्या सर्च करते हैं, कौन सी वेबसाइट देखते हैं, यूट्यूब पर क्या देखते हैं, किस तरह के विज्ञापन पर क्लिक करते हैं या किस जगह से इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, इन सबका कुछ हिस्सा आपकी डिजिटल ऐक्टिविटी का रिकॉर्ड बन रहा है. गूगल खुद बताता है कि उसकी सर्विसेज, आपकी सेटिंग के आधार पर, आपकी सर्च, वेबसाइट और ऐप ऐक्टिविटी, ऐड से जुड़ी ऐक्टिविटी और लोकेशन जैसी जानकारी का इस्तेमाल कर सकती हैं. कंपनी यह भी बताती है कि लोकेशन की जानकारी का इस्तेमाल ऐड को आपके लिए ज्यादा उपयोगी बनाने के लिए किया जा सकता है.
Meta की प्राइवेसी पॉलिसी भी बताती है कि कंपनी यूजर के पोस्ट, कमेंट, देखे और पसंद किए गए कंटेंट, इस्तेमाल किए गए फीचर, खरीदारी, हैशटैग और प्लेटफॉर्म पर ऐक्टिविटी का ड्यूरेशन जैसी जानकारी इकट्ठा करती है. कंपनी यह भी बताती है कि डिवाइस और उससे जुड़ी कुछ जानकारी और दूसरी कंपनियों और साझेदारों से मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल किया जा सकता है.
यहां एक बात साफ समझना जरूरी है. इसका मतलब यह नहीं है कि कोई कर्मचारी बैठकर हर समय आपकी जिंदगी देख रहा है. असली कहानी इससे कहीं ज्यादा बड़ी और तकनीकी है. अरबों लोगों से मिलने वाली जानकारी को मशीनें और एल्गोरिदम बड़े पैमाने पर समझते हैं. इससे कंपनियां यह अंदाजा लगा सकती हैं कि लोगों की दिलचस्पी किस चीज में है और उन्हें किस तरह का विज्ञापन या एक्सपीरिएंस दिखाया जाए.
....जहां आजादी और डेटा के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है
मान लीजिए आपने किसी वेबसाइट पर जूते खोजे. उसके बाद आपको दूसरे प्लेटफॉर्म पर उसी तरह के जूतों के विज्ञापन दिखने लगे. आपने किसी बीमारी के बारे में जानकारी खोजी और फिर उससे जुड़े विज्ञापन दिखाई देने लगे. आपने किसी शहर में घूमने की योजना बनाई और कुछ समय बाद उसी जगह के होटल और उड़ानों के विज्ञापन सामने आने लगे.
आपको लग सकता है कि इंटरनेट ने आपकी जरूरत समझ ली. लेकिन असली सवाल है, इंटरनेट ने आपकी जरूरत समझी कैसे?
अमेरिका की फेडरल ट्रेड कमिशन (FTC) ने 2024 में बड़ी सोशल मीडिया और वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनियों की डेटा की जांच की थी. FTC ने कहा कि इन कंपनियों ने लोगों की निजी जानकारी बड़े पैमाने पर इकट्ठा की और उससे कमाई की. रिपोर्ट में डेटा को लंबे समय तक रखने, यूजर की जानकारी को पर्याप्त रूप से कम न करने और लोगों को अपने डेटा पर सीमित नियंत्रण देने जैसी चिंताएं भी सामने आईं. यह किसी एक कंपनी की कहानी नहीं है. यह पूरे डिजिटल कारोबार के मॉडल से जुड़ा बड़ा सवाल है.
...कहने को फ्री, लेकिन किस कॉस्ट पर?
इंटरनेट की कई बड़ी सर्विसेज हमें मुफ्त मिलती हैं. फेसबुक इस्तेमाल करने के लिए अलग से पैसा नहीं देना पड़ता. इंस्टाग्राम बेसिक सेवा के लिए कोई मासिक फीस नहीं है. गूगल सर्च के लिए भी हम सीधे पैसे नहीं देते. लेकिन इन कंपनियों को अरबों डॉलर का कारोबार करना है.
विज्ञापन इस कहानी का बहुत बड़ा हिस्सा है. और विज्ञापन जितना सही व्यक्ति तक पहुंचेगा, उसके लिए उतना ज्यादा पैसा बनाएगा. इसलिए लोगों की पसंद, उनकी ऐक्टिविटी और उनके बिहेवियर को समझना डिजिटल ऐड्स की इकॉनमी का अहम हिस्सा बन गया है. यानी जिस चीज को हम मुफ्त सेवा समझते हैं, उसके पीछे डेटा की भी एक कीमत है. जिस कंपनी के पास ज्यादा डेटा है वो ज्यादा फायदे में है. अब तो आलम ये है कि मेटा और गूगल जैसी कंपनियां किसी देश के सत्तापलट तक में इनडायरेक्टली बड़ा रोल प्ले कर रही हैं.
इसीलिए 15 अगस्त के दिन डिजिटल आजादी का सवाल सिर्फ प्राइवेसी का सवाल नहीं है. यह चुनाव की आजादी का भी सवाल है. अगर कोई सिस्टम आपके बारे में इतना जानता है कि वह अंदाजा लगा सकता है कि आप किस तरह की खबर पढ़ेंगे, किस विज्ञापन पर क्लिक करेंगे या किस तरह के वीडियो पर ज्यादा समय बिताएंगे, तो वह आपकी स्क्रीन पर दिखाई देने वाली दुनिया को प्रभावित कर सकता है.
आपके सामने विकल्प बहुत हैं, लेकिन उन विकल्पों को आपके सामने रखने वाला सिस्टम आपका नहीं है. यही वजह है कि आज सोशल मीडिया पर आजादी का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आप क्या लिख सकते हैं. सवाल यह भी है कि आपकी बात कितने लोगों तक पहुंचेगी और कौन तय करेगा कि वह किसे दिखाई जाएगी.
यहां AI इस पूरी कहानी को और बड़ा बना रहा है. आज AI आपके सवालों के जवाब देता है. कल वह आपकी पसंद, आदत और जरूरत को पहले से समझकर आपके लिए चीजें तैयार कर सकता है. जितना ज्यादा AI हमारी डिजिटल जिंदगी में आएगा, उतना ज्यादा निजी डेटा और डिजिटल ऐक्टिविटी की अहमियत बढ़ेगी.
1947 में भारत ने यह तय किया कि देश की सत्ता किसी विदेशी ताकत के हाथ में नहीं होगी. आज डिजिटल दुनिया में सवाल थोड़ा अलग है, हम अपनी डिजिटल जिंदगी की सत्ता किसके हाथ में दे रहे हैं? क्या हम तय कर सकते हैं कि हमारा डेटा कितना इकट्ठा किया जाए? क्या हमें साफ-साफ पता है कि हमारा डेटा किस काम में इस्तेमाल हो रहा है? क्या किसी ऐप को दी गई अनुमति वापस लेना उतना ही आसान है जितना उसे देना?
डिजिटल स्पेस में 'ना' कहने की आजादी है?
क्या हम किसी प्लेटफॉर्म से पूरी तरह बाहर निकल सकते हैं, बिना अपनी रोजमर्रा की डिजिटल जिंदगी मुश्किल बनाए? और बड़ा सवाल, क्या हमारे पास सच में ‘ना’ कहने का विकल्प है?
कागज पर जवाब अक्सर हां होता है. प्राइवेसी सेटिंग्स हैं, परमिशन हैं, डेटा कंट्रोल हैं. Apple ने 2021 में ऐप ट्रैकिंग ट्रांसपेरेंसी के जरिए iPhone यूजर को यह चुनने का अधिकार दिया कि कोई ऐप दूसरी कंपनियों की ऐप और वेबसाइटों पर उसकी ऐक्टिविटी को ट्रैक कर सकती है या नहीं.
गूगल भी यूजर को अपनी ऐक्टिविटी और लोकेशन से जुड़ी कई सेटिंग देखने, बदलने और कुछ जानकारी हटाने के विकल्प देता है. लेकिन असली समस्या यह है कि इन विकल्पों को समझना आम यूजर के लिए आसान नहीं होता. हममें से कितने लोग किसी ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी के दर्जनों पन्ने पढ़कर ‘Agree’ करते हैं?
कितने लोग हर ऐप की परमिशन सेटिंग्स चेक करते हैं? कितने लोगों को पता है कि उनके फोन में कौन-कौन सी जानकारी सेव हो रही है? ज्यादातर लोग नहीं.
हमारे सामने अक्सर एक बहुत आसान विकल्प रखा जाता है, ऐक्सेप्ट करो और आगे बढ़ो. मामला यहां ऐक्सेप्ट और डिनाई का नहीं है, ऐक्सेप्ट या ऐक्सेप्ट. डिनाई करेंगे तो आप सर्विस यूज़ ही नहीं कर पाएंगे. यहीं डिजिटल आजादी की सबसे बड़ी विडंबना है. हमने दुनिया तक पहुंचने की आजादी हासिल कर ली, लेकिन अपनी डिजिटल पहचान पर पूरा कंट्रोल ही हासिल नहीं किया.
Source: AajTak
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एक स्टूडेंट ने ऐसा पोर्टल बनाने का दावा किया है जो रिश्वतखोरों के लिए सिरदर्द बन सकता है. खास तौर पर सरकारी दफ्तरों में रिश्वत मांगने वालों के लिए. इस पोर्टल पर लाइव रिश्वत रिपोर्ट की जा सकती है. रिपोर्ट करने वालों की जानकारी सीक्रेट रखने का दावा किया गया है.एक स्टूडेंट ने ऐसा पोर्टल बनाने का दावा किया है जो रिश्वतखोरों के लिए सिरदर्द बन सकता
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साइबर ठगी के मास्टरमाइंड को पुलिस ने गिरफ्तार किया है, जिसका हाथ करीब 1071 करोड़ रुपये की ठगी में रहा है. पुलिस ने बताया है कि वह डिजिटल अरेस्ट या अन्य साइबर ठगी के जरिए से आने वाली कम को एक घंटे में अलग-अलग हिस्सों में बांटता फिर उसको 1754 बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करता है. उसका कनेक्शन चीन में बैठे साइबर ठगों से था.साइबर ठगी के मास्टरमाइंड को पुलिस ने
6 days ago
Rapido में बाइक टैक्सी चलाने वाले दो लोगों ने अपने बैंक अकाउंट को किराए पर दिया, जिसके बदले उनको हर एक ट्रांजैक्शन पर करीब 3000 से 5000 रुपये का किराया मिलता था. उनके बैंक खाते का इस्तेमाल 25 करोड़ रुपये की ठगी में हुआ है. अब पुलिस उनको गिरफ्तार कर चुकी है. इस तरह के बैंक खातों से म्यूल अकाउंट कहा जाता है और ऐसा करने से बचना चाहिए.Rapido में बाइक टैक्सी चलाने वाले
6 days ago